पीठाधीश्वर ने कहा—“पर्चे को भगवान न समझें, बीमारी में दवा जरूरी”
पुरानी कहावत है—
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर,
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”
आज के दौर में यह कहावत इसलिए प्रासंगिक लगती है, क्योंकि कई बार लोग बिना सोच-विचार के किसी बात पर भरोसा कर लेते हैं और बाद में उसका परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलता।
मध्यप्रदेश में इन दिनों दिव्य दरबार और पर्चे के दावों को लेकर चर्चा देखने को मिल रही है। पहले छतरपुर और पंडोखर धाम जैसे स्थानों पर इस तरह के दरबारों की चर्चा होती थी, लेकिन अब मालवांचल में भी दिव्य दरबार आयोजित किए जा रहे हैं।
रतलाम जिले में जावरा के समीप स्थित मां कालिका धाम शक्तिपीठ बोरदा के पीठाधीश्वर मनोज जी कश्यप द्वारा भी दिव्य दरबार आयोजित किए जाते हैं। यहां मंच से श्रद्धालुओं को बुलाकर पर्चे लिखने और उसमें उनकी समस्याओं अथवा सवालों का उल्लेख करने का दावा किया जाता है। कई बार श्रद्धालुओं से ही पर्चा पढ़वाया जाता है।
धराड़ में लगा रात्रिकालीन दिव्य दरबार
रतलाम जिले के धराड़ में मां कालिका धाम शक्तिपीठ बोरदा के पीठाधीश्वर मनोज जी कश्यप ने रात्रिकालीन दिव्य दरबार लगाया। इस दौरान उन्होंने मंच से ऐसी बातें कहीं, जिनकी चर्चा अब हो रही है।
पर्चा लिखते हुए उन्होंने कहा कि आजकल एक तरह का “चोचला पन” चल पड़ा है। उन्होंने कहा कि जिनका आचरण पूजने योग्य नहीं है, उनके चरण पूजे जा रहे हैं और उनके पदचिह्नों को कपड़े पर बनाकर दीवारों पर लगाया जा रहा है। उन्होंने लोगों को ऐसे प्रपंचों में नहीं पड़ने की बात कही और यह भी कहा कि पर्चा लिखने वाले को भगवान समझ लेना उचित नहीं है।
बीमारी में दवा जरूरी, डॉक्टर से कराएं इलाज
दिव्य दरबार में स्वास्थ्य संबंधी कई अर्जियां भी सामने आईं। इस पर पीठाधीश्वर ने लोगों को किसी के बहकावे या भ्रम में न पड़ने की सलाह दी।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बीमारी से पीड़ित है तो उसका इलाज दवा और चिकित्सकीय परामर्श से ही कराया जाना चाहिए। दुआ के साथ दवा लेना भी जरूरी है और लोगों को बीमारी की स्थिति में डॉक्टर से ही उपचार करवाना चाहिए।
अंधविश्वास के बजाय जागरूकता का संदेश?
इस दिव्य दरबार की खास बात यह बताई गई कि यहां दिखावे, झाड़-फूंक या मेडिकल साइंस को चुनौती देते हुए बीमारी ठीक करने का दावा नहीं किया जाता। इसके बजाय लोगों को चिकित्सा उपचार लेने और किसी भी दावे पर आंख मूंदकर विश्वास न करने की बात कही गई।





