सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने खोली तहसील की पोल, “दलाल”, अफसर सीट पर विराजमान, तहसीलदार बने बॉडीगार्ड।

संदीप मौर्य✍️

तहसील प्रांगण में स्टाम्प वेंडर सुनील श्रीवास उर्फ मंजा का दबदबा, आम जनता मजबूरन दे रही सुविधा शुल्क

कटनी जिले के स्लीमनाबाद तहसील कार्यालय में भ्रष्टाचार और दलाली का ऐसा मकड़जाल बुना गया है कि आम नागरिक अपने वैधानिक कार्यों को भी बिना सुविधा शुल्क चुकाए पूरा नहीं करा पा रहे हैं। तहसील प्रांगण में ही खुलेआम दलाल सक्रिय हैं, जिनमें प्रमुख नाम सुनील श्रीवास उर्फ मंजा का सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि मंजा को बाकायदा तहसील प्रशासन की ओर से स्टांप वेंडर का लाइसेंस देकर संरक्षण दिया गया है। इसके चलते वह न केवल तहसील परिसर में बैठकर दलाली करता है, बल्कि अधिकारियों के संरक्षण में लोगों से धन वसूली तक करता है।

“स्लीमनाबाद तहसील में भ्रष्टाचार का इतिहास है लंबा, 4 माह पूर्व EWS सर्टिफिकेट की खुली थी पोल, अभी तक दोषियों पर कार्यवाही नहीं, दोषी पाए गए व्यक्ति तहसील स्लीमनाबाद व एस डी एम कार्यलयों में अभी भी कार्यरत, जाँच प्रतिवेदन से हुआ खुलासा”

सूत्रों की माने तो न्यायिक कार्यवाहियां भी दलालों के हाथ में चली गई हैं। सीआरपीसी की धारा 107/116 जैसे प्रकरणों में नोटिस, सम्मन और खात्मा तक के दस्तावेज स्लीमनाबाद तहसील में अधिकारियों की सह पर सुनील श्रीवास उर्फ मंजा द्वारा किया जाता हैं। उसके एवज में फरियादियो से मोटी रकम वसूली जाती है।

जनता का आरोप है कि तहसील में किसी भी काम—जैसे खसरा-खतौनी की नकल, भू-अधिकार पुस्तिका, नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा, डायवर्सन या अतिक्रमण संबंधी कार्य—के लिए सरकारी शुल्क के अलावा निश्चित राशि सुविधा शुल्क के नाम पर वसूली जाती है। जो लोग सुविधा शुल्क देते हैं, उनके काम तुरंत निपटा दिए जाते हैं, जबकि शुल्क न देने वालों के आवेदन महीनों तक लंबित रख दिए जाते हैं।

सूत्रों के अनुसार, तहसील कार्यालय में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि मंजा की पकड़ इतनी मजबूत है कि कोई भी कार्य करवाने के लिए लोगों को उसी के पास भेजा जाता है। यहां तक कि स्थानीय लोग कहते हैं—“यदि एसडीएम या तहसीलदार से कोई काम करवाना है तो मंजा को सेट करो, सब काम आसानी से हो जाएगा।”

शिकायतों के बाद भी नहीं बदला सिस्टम, अधिकारी दे रहे संरक्षण

भ्रष्टाचार और दलाली की शिकायतें स्थानीय लोग कई बार एसडीएम राकेश चौरसिया और तहसीलदार सुश्री सारिका रावत तक भी पहुंचा चुके हैं। कई बार ज्ञापन दिए गए, लेकिन इसके बावजूद भी सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया। आरोप है कि अधिकारी खुद मंजा को संरक्षण देते हैं।

तहसील में दलाल के इस प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मंजा न केवल प्रशासनिक कार्यों में दखल देता है, बल्कि तहसीलदार के शासकीय वाहन का भी खुलेआम दुरुपयोग करता है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में सुनील श्रीवास उर्फ मांजा को तहसीलदार की शासकीय गाड़ी की अफसर वाली सीट पर बैठे देखा गया, जबकि नायब तहसीलदार हर्षवर्धनराम टेके गार्ड की सीट पर बैठे नजर आए। पूछने पर यह सफाई दी गई कि मांझा तहसील कार्यालय में अर्जी लेखक का काम करता है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या एक अर्जी लेखक को अधिकारी वाली सीट पर बैठने का अधिकार है और क्या तहसील का नायब तहसीलदार उसका निजी गार्ड बन सकता है?

जनता में इस पूरे मामले को लेकर गहरा आक्रोश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर प्रशासन कब तक दलालों के इशारे पर काम करता रहेगा और कब तक आम आदमी अपने अधिकारों के लिए सुविधा शुल्क चुकाने को मजबूर रहेगा।

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