कटनी में सरपंच की दबंगई! — दलित युवक पर मूत्र त्याग, माँ को बाल पकड़कर घसीटा, थाने में मामला दर्ज

दमोह के बाद अब कटनी में भी अमानवीय अत्याचार, इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना

कटनी। (संदीप मौर्य) — मध्यप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं। दमोह जिले में दलित से पैर धुलवाकर पानी पिलाने की शर्मनाक घटना के बाद अब कटनी जिले के स्लीमनाबाद थाना क्षेत्र से दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक सरपंच और उसके परिजनों ने मिलकर एक दलित युवक को न सिर्फ बेरहमी से पीटा, बल्कि उसके शरीर पर मूत्र त्यागकर अमानवीयता की सारी सीमाएँ लांघ दीं।

घटना स्लीमनाबाद थाना क्षेत्र के ग्राम मटवारा की है। यहाँ रहने वाले दलित युवक राजकुमार चौधरी ने अपने खेत के पास चल रहे अवैध खनन का विरोध किया। यह विरोध ही उसके लिए अभिशाप बन गया।
गांव के सरपंच रामानुज पांडेय, उनके पुत्र पवन पांडेय, भतीजे सतीश पांडेय, राम बिहारी हल्दकार और उनके साथियों ने राजकुमार को पकड़कर लात-घूंसों से पीटा, जातिसूचक गालियाँ दीं और फिर उस पर मूत्र त्यागकर उसे अपमानित किया।

जब राजकुमार की माँ अपने बेटे को बचाने पहुँची, तो दबंगों ने उसे भी नहीं छोड़ा। महिला के बाल पकड़कर घसीटा गया और बुरी तरह मारा गया। पीड़ित युवक की हालत बिगड़ने पर परिजनों ने उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ वह तीन दिनों तक इलाजरत रहा।

पीड़ित ने बताया कि दबंगों ने उसे धमकी दी कि अगर उसने पुलिस में शिकायत की तो उसे और उसके परिवार को जान से मार दिया जाएगा। भय और सामाजिक दबाव के चलते युवक कुछ दिन तक चुप रहा, लेकिन बाद में उसने पुलिस अधीक्षक कटनी से न्याय की गुहार लगाई।

मामले के मीडिया में आने के बाद प्रशासन हरकत में आया। पुलिस ने आईएनएस (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 296, 115(2), 351(3), 126(2) समेत
अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएँ 3(1)(a), 3(1)(c), 3(1)(e), 3(2)(va) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

इस घटना ने एक बार फिर प्रदेश में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। एक ओर सरकार सामाजिक समरसता और “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर गांवों में अब भी जाति की जंजीरें इंसानियत को बेड़ियों में जकड़े हुए हैं।

सवाल उठता है —

क्या आज भी दलित होने की सज़ा इस तरह दी जाएगी?
क्या हमारे गांवों में न्याय का अर्थ सिर्फ ताकतवरों के हक तक सीमित रह गया है?
यह मामला केवल एक व्यक्ति या गांव का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो 21वीं सदी में भी इंसान को उसकी जाति से तोलती है।

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