लघु वृंदावन की आस्था: बांधा-इमलाज का ऐतिहासिक श्री राधा-कृष्ण मंदिर

संदीप मौर्य✍️

कटनी जिले की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल बांधा-इमलाज गांव का श्री राधा-कृष्ण मंदिर, अपनी अद्भुत नक्काशी, प्राचीन कलाकृतियों और चमत्कारों से जुड़ी जनश्रुतियों के कारण क्षेत्रवासियों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। पुष्पावति नगरी बिलहरी से लगभग 10 से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर आज भी अपनी भव्यता और ऐतिहासिक विरासत के कारण लोगों को आकर्षित करता है।
स्थानीय लोगों और बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, गांव के तत्कालीन मालगुजार पंडित गोरेलाल पाठक ने इस भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया था और मंदिर की नींव रखवाई थी। किंतु अल्पायु में उनके निधन के बाद उनका यह सपना अधूरा रह गया। ऐसे समय में उनकी पत्नियों भगौता देवी एवं पूना देवी ने उनके धार्मिक संकल्प को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया।
बताया जाता है कि दोनों पत्नियां भगवान श्रीकृष्ण को अपने पुत्र और राधारानी को अपनी पुत्रवधू के समान मानती थीं। इसी गहरी श्रद्धा और अटूट आस्था के साथ उन्होंने मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया। वर्ष 1915 में मंदिर निर्माण प्रारंभ हुआ, जो लगभग नौ वर्षों की लंबी अवधि के बाद वर्ष 1924 में पूर्ण हुआ।
मंदिर के निर्माण में उस समय लगभग 15 हजार रुपये की राशि खर्च की गई थी। इसके अतिरिक्त मालगुजार को गांव से मालगुजारी के रूप में प्राप्त होने वाले 11 वर्षों के अनाज को बेचकर प्राप्त राशि भी मंदिर निर्माण में लगाई गई। यह तथ्य उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक आस्था के साथ-साथ मंदिर निर्माण के प्रति परिवार के समर्पण को दर्शाता है।
मंदिर निर्माण पूर्ण होने के लगभग दो वर्ष बाद, वर्ष 1926 में श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई। इसके बाद से यह मंदिर क्षेत्र की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
बांस के पेड़ से सुनाई दी बांसुरी की मधुर धुन
मंदिर के इतिहास से जुड़ी सबसे चर्चित जनश्रुतियों में वर्ष 1928 की एक घटना का उल्लेख मिलता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, भादों माह में लगातार सात दिनों तक वर्षा हुई थी। इसी दौरान मंदिर परिसर में लगे एक बांस के पेड़ से लगातार तीन दिनों तक बांसुरी की मधुर धुन सुनाई देने की बात कही जाती है।
बताया जाता है कि उस अद्भुत धुन को सुनने के लिए गांव के लोग बड़ी संख्या में मंदिर परिसर में एकत्रित हो गए थे। जनश्रुतियों के अनुसार, लोग उस अलौकिक संगीत में इतने भावविभोर हो गए कि भोजन-पानी और रात के विश्राम तक की सुध भूल गए। इसी घटना के बाद से श्रद्धालुओं ने इस चमत्कारिक और आस्था से जुड़े क्षेत्र को “लघु वृंदावन” कहना प्रारंभ कर दिया।
आज भी स्थानीय लोगों के बीच यह घटना गहरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनाई जाती है।
पत्थरों में उकेरी गई कलाकारों की अद्भुत कला
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी शानदार पत्थर की नक्काशी और प्राचीन स्थापत्य कला शामिल है। मंदिर के निर्माण में लगाए गए पत्थरों को आकर्षक और जीवंत स्वरूप देने का महत्वपूर्ण कार्य बिलहरी के प्रसिद्ध कलाकार बादल खान ने किया था।
उनकी कलात्मक प्रतिभा आज भी मंदिर की दीवारों और पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी के रूप में दिखाई देती है। मंदिर निर्माण और कलात्मक कार्यों में सरजू बर्मन तथा भिम्मे नामक कारीगरों ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर निर्माण में उपयोग किया गया पूरा पत्थर सैदा गांव से लाया गया था। उस दौर में परिवहन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, इसलिए पत्थरों को बैलगाड़ी के माध्यम से लाया गया। जनश्रुतियों में यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदिर निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद पत्थर ढोने में प्रयुक्त बैलगाड़ी में जुते भैंसे ने मंदिर की सीढ़ियों के समीप ही अंतिम सांस ली थी।
आस्था, इतिहास और कला की अमूल्य धरोहर
लगभग एक शताब्दी से अधिक पुराना बांधा-इमलाज का श्री राधा-कृष्ण मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, लोकआस्था और प्राचीन स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक है।
पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी, मंदिर निर्माण के पीछे समर्पण की प्रेरक कहानी और इससे जुड़ी चमत्कारिक जनश्रुतियां इस स्थान को विशेष बनाती हैं। यही कारण है कि आज भी श्रद्धालु और इतिहास एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग इस मंदिर को श्रद्धा और कौतूहल के साथ देखते हैं।
बांधा-इमलाज का यह ऐतिहासिक श्री राधा-कृष्ण मंदिर वास्तव में आस्था और कला का ऐसा संगम है, जहां इतिहास पत्थरों में बोलता है और लोकविश्वास आज भी “लघु वृंदावन” की पहचान को जीवंत बनाए हुए है।

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