बांधा-इमलाज का राधा-कृष्ण मंदिर, जिसे कहते हैं ‘लघु वृंदावन’

बांधा-इमलाज का ऐतिहासिक राधा-कृष्ण मंदिर, जिसे लोग कहते हैं ‘लघु वृंदावन’


कटनी जिले के बांधा-इमलाज गांव में स्थित श्री राधा-कृष्ण मंदिर अपनी भव्यता, अद्भुत नक्काशी और ऐतिहासिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। करीब एक सदी पुराना यह मंदिर स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक मान्यताओं के चलते लघु वृंदावन के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि यहां कभी बांस के पेड़ से तीन दिनों तक बांसुरी की मधुर धुन सुनाई दी थी।

देखिए हमारी यह विशेष रिपोर्ट।
मंदिर का मुख्य द्वार और बाहरी दृश्य
कटनी जिले की ऐतिहासिक पुष्पावती नगरी बिलहरी से लगभग 10 से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बांधा-इमलाज गांव… जहां बना हुआ है श्री राधा-कृष्ण का ऐतिहासिक मंदिर।

शानदार नक्काशी… प्राचीन स्थापत्य कला… और श्री राधा-कृष्ण के प्रति अटूट श्रद्धा… इस मंदिर को क्षेत्र की विशेष धार्मिक धरोहर बनाती है।
स्थानीय लोगों के बीच यह मंदिर लघु वृंदावन के नाम से प्रसिद्ध है।

मंदिर की नक्काशी और पुरानी संरचना
बताया जाता है कि गांव के तत्कालीन मालगुजार पंडित गोरेलाल पाठक ने इस भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया था। लेकिन अल्पायु में उनके निधन के बाद मंदिर निर्माण का कार्य अधूरा रह गया।
इसके बाद उनकी पत्नियों भगौता देवी और पूना देवी ने उनके धार्मिक संकल्प को आगे बढ़ाया।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, दोनों भगवान श्रीकृष्ण को अपने पुत्र और राधारानी को पुत्रवधू के समान मानती थीं।

मंदिर का निर्माण और इतिहास
बताया जाता है कि वर्ष 1915 में मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया गया। लगभग नौ वर्षों तक चले निर्माण कार्य के बाद वर्ष 1924 में मंदिर बनकर तैयार हुआ। इसके दो वर्ष बाद यानी वर्ष 1926 में श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई।
उस दौर में मंदिर निर्माण में लगभग 15 हजार रुपये खर्च किए गए थे। इसके अलावा मालगुजारी के रूप में प्राप्त होने वाले 11 वर्षों के अनाज को बेचकर मिली राशि का उपयोग भी मंदिर निर्माण में किया गया।


पत्थरों की नक्काशी के क्लोजअप
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है इसकी अद्भुत पत्थर की नक्काशी।
बताया जाता है कि मंदिर निर्माण में उपयोग किए गए पत्थर सैदा गांव से लाए गए थे।
पत्थरों को तराशकर उन्हें आकर्षक स्वरूप देने का कार्य बिलहरी के कलाकार बादल खान ने किया था। उनके साथ सरजू बर्मन और भिम्मे नाम के कारीगरों ने भी मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आज भी मंदिर की नक्काशी उस दौर की उत्कृष्ट कला और कारीगरों की प्रतिभा की कहानी कहती है।

बांसुरी की धुन से जुड़ी जनश्रुति
लेकिन बांधा-इमलाज के इस मंदिर की पहचान केवल इसकी कला और इतिहास तक सीमित नहीं है। इस मंदिर से एक ऐसी जनश्रुति भी जुड़ी हुई है, जिसने इसे लघु वृंदावन की पहचान दिलाई। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार वर्ष 1928 के भादों माह में लगातार सात दिनों तक बारिश हुई थी। इसी दौरान मंदिर परिसर में लगे एक बांस के पेड़ से लगातार तीन दिनों तक बांसुरी की मधुर धुन सुनाई देने की बात कही जाती है। लोकमान्यता के अनुसार उस अद्भुत धुन को सुनने के लिए गांव के लोग बड़ी संख्या में मंदिर परिसर पहुंच गए थे।
कहा जाता है कि लोग उस धुन में इतने भावविभोर हो गए कि खाना-पानी और विश्राम तक की सुध भूल गए।
इसी घटना के बाद से इस धार्मिक स्थल को लोग लघु वृंदावन के नाम से पुकारने लगे।


श्रद्धालु और भगवान के दर्शन
आज भी श्री राधा-कृष्ण मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
मंदिर की भव्यता… पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी… और इससे जुड़ी पीढ़ियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
बांधा-इमलाज का यह मंदिर आज भी आस्था, इतिहास और कला के अद्भुत संगम के रूप में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

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