संदीप मौर्य
कटनी जिले के स्लीमनाबाद तहसील में आदिवासी जमीन से जुड़ा ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे राजस्व तंत्र की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, एक शासकीय शिक्षक ने कथित रूप से कूट रचित तरीके अपनाते हुए एक आदिवासी की लगभग 15 एकड़ जमीन अपने नाम दर्ज करा ली, जबकि इस भूमि के विक्रय के लिए भू-स्वामी को कलेक्टर से अनुमति ही नहीं मिली थी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब कलेक्टर ने साफ तौर पर अनुमति अस्वीकार कर दी थी, तो फिर यह जमीन शिक्षक के नाम कैसे चढ़ गई?
क्या राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी बिना कर्मचारियों की मिलीभगत संभव है?
सूत्र बताते हैं कि आदिवासी भू-स्वामी ने नियमों के तहत अनुमति के लिए आवेदन किया था, जिसे कलेक्टर ने स्पष्ट आधारों पर खारिज कर दिया। इसके बावजूद फाइलों में ‘जादू’ चल कर जमीन शिक्षक के नाम हो गई। इससे बड़ा प्रशासनिक विसंगति का उदाहरण और क्या हो सकता है?
और चौंकाने वाली बात यह है कि संबंधित शिक्षक विवादित जमीन पर बोरिंग करवाकर खेती भी शुरू कर चुका है। यह सीधे तौर पर सवाल उठाता है कि राजस्व विभाग, पटवारी और उच्च अधिकारी किसकी शह पर इस अवैध कब्जे को नजरअंदाज कर रहे हैं?
स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि स्लीमनाबाद क्षेत्र में भोले-भाले आदिवासियों की जमीनों को लेकर यह कोई पहला मामला नहीं है। जमीनों को हड़पने का पूरा “सिस्टमेटिक नेटवर्क” सक्रिय बताया जा रहा है, जहां आदिवासी न तो प्रक्रिया समझ पाते हैं और न ही कानूनी पेच।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर घोटाले पर क्या कार्रवाई करता है— क्या दोषियों पर सख्त दंड होगा, या फिर मामला भी कई अन्य फाइलों की तरह धूल खाता रह जाएगा?





